हाँ, मैं बदल गयी हूँ !

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अब नहीं तकती राह मैं हर हाँ की,

नहीं करती इंतज़ार सहमति का,

मुझे फ़ख़्र है अपने आप पर 

ग़ुरूर है अपने ज़मीर पर,

हाँ, मैं बदल गयी हूँ I 

 

नहीं है चाह मुझे हमदर्दी की,

ना इच्छा है सहानुभूति की,

मैं हूँ अपने आप में मशगूल 

बेक़रार हूँ करने को एक नया शोर 

हाँ, मैं बदल गयी हूँ I 

 

शोर जो सुनाई दे बहरे को,

दिखाई दे जो एक अंधे को,

ठहरा दे  साँसे जो इस ज़माने की 

तोड़ दे हर बंदिश पैमाने की 

हाँ, मैं बदल गयी हूँ I