
वो भोर अब कहाँ ?
जाने कहाँ गयी वो भोर
जो भर देती थी सबका आँचल ,
एक मीठी सी मनुहार के साथ,
एक प्यारे से एहसास के साथ I
वो हसरतों की सुबह ,वो कसरतों की सुबह ,
वो 'ॐ' की झंकार ,वो बड़ों की हुंकार,
जो समेट लेती थी अपने आप में ,
और बिखरा जाती थी अपना जादू I
भोर तो आज भी होती है ,
खोलती है एक नया अध्याय,
पर अब जैसे सब
सिमट सा गया है I
कुछ सूख सी गयी है ,
वो प्रेम की बहती अविरल धारा I
हर कोई मसरूफ है
पाने को एक नया आयाम I
बहुत परायापन रहने लगा है
अब अपनेपन में,
बहुत कुछ पाने की चाह में
क़ैद हैं सब अपने आप में I
जो हम यह समझ लें ,
कि बाहर से मुक्त हो
भीतर में समाना ही
जीवन का सार है ,
तो लौट आएगी वो भोर,
होगा नया उजाला ,
बिखर जाएगा एक जादू सा
इस जीवन में , और हर
सुबह को मिलेगी एक नयी पहचान!
