
वो फ़्रेम की कहानी !
ख़ाली दीवार पर
टंगा वो फ़्रेम,
और फ़्रेम में टंगा वो जीवन,
जो ताउम्र लड़ता रहा अपनों के लिए
नहीं बता पाता अपनी दुशवारियाँ I
नहीं बता पाता उस बेरंग जीवन की कहानी,
जो भरने चला था रंग चहुँ ओर I
चाहत थी उसकी पाई -पाई जोड़ कर
बना ले अपने अपनों के लिए महल
छोड़ जाए एक विरासत
अपनी विरासत के नाम I
पर किसे मालूम था,
जब लेगा वो अंतिम साँस,
उसके अपने ही बदलने लगेंगे कांधा,
पहुँचाने को उसको उसकी मंज़िल I
उसका यह सूनापन देता है संदेश,
जी लो यह जीवन अपनी ख़ातिर,
क्योंकि कोई ना है तुम्हारी ख़ातिर I
तुम तुम हो, जब तक है साँस,
फिर तो हो मांस का एक गट्ठर,
जिसे मिला देना है बिछड़ी माटी से
कर हवाले शोलों के I
और फिर शुरू होना है
एक और सफ़र,
हर साल की बरसी पर
जब तुम बरबस ही खिंचे चले आओगे ,
अपने अपनों के पास I
महसूस करोगे वो धड़कन,
मुस्कुराओगे उस आयोजन पर,
और फिर से चले जाओगे
उसी फ़्रेम की दुनिया में I
